अब फर्क नहीं पड़ता

ab-fark-nahi-padta

This is the very first time I’m posting my poem here on blog which is supposed to be there on my official website Nishabd. I have just finished this sitting in my office and I’m very tired to make it format ready for my website. I will soon post it there too.

गुमनामी बड़ी हसींन लगती है
खुदका असली वजूद ढूंढना है मुझे
कोई मुझे ढूंढे या न ढूंढे
अब फर्क नहीं पड़ता

सपनोंमे दुनिया अलग लगती है
दुनिया बदलनेका ख्वाब देखना है मुझे
कोई मेरा ख्वाब देखे या न देखे
अब फर्क नहीं पड़ता

कुछही रिश्तोंसे ज़िन्दगी लगती है
मेरे अपनोंकी परवाह करनी है मुझे
कोई मेरी परवाह करे या न करे
अब फर्क नहीं पड़ता

अतीत सुनहरी परछाई लगती है
बीते लम्होंको याद करना है मुझे
कोई मुझे याद करे या न करे
अब फर्क नहीं पड़ता

कहानिया सच्ची झूठी लगती है
खुदके किस्से खुदको सुनाने है मुझे
कोई मुझे किस्से सुनाये या न सुनाये
अब फर्क नहीं पड़ता

ज़िन्दगी प्यारकी मोहताज लगती है
सबसे हसींन मौतकी चाहत है मुझे
कोई मुझे चाहे या न चाहे
अब फर्क नहीं पड़ता

Pratik Akkawar

Pratik Akkawar

I am occasionally a poet, blogger and an amateur writer, trying to put my thoughts into words and sometimes words into poems. Besides that, I am a day dreamer, lazy reader and patient listener. You live only once so, breath, smile, laugh and love. Thank you for passing by. Stay blessed. Cheers.

You may also like...

5 Responses

  1. Bahut khoob likha hai 🙂

  2. Avatar SimplyKaruna says:

    Wah! bahot achcha likha hai 🙂

  3. Avatar Hargun says:

    ”गुमनामी बड़ी हसींन लगती है
    खुदका असली वजूद ढूंढना है मुझे
    कोई मुझे ढूंढे या न ढूंढे
    अब फर्क नहीं पड़ता

    सपनोंमे दुनिया अलग लगती है
    दुनिया बदलनेका ख्वाब देखना है मुझे
    कोई मेरा ख्वाब देखे या न देखे
    अब फर्क नहीं पड़ता”

    Awesome! The above paragraphs give it a brilliant start, filled with positivity and strength to dream. Keep doing great work.

Leave a Reply

%d bloggers like this: